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जीवन को होशपूर्वक जीएं

         जीवन को होशपूर्वक जीएं 

हम जीवन में सभी कार्य बस यूं ही करते जाते हैं यंत्र की भांति हमें पता ही नहीं होता कि हम वह कार्य क्यों कर रहे हैं, उसको करने का उद्देश्य क्या है हमें नहीं पता होता,  कोई हमसे कहता है कि यह कार्य कर लो क्योंकि सभी लोग यही कार्य कर रहे हैं अतः तुम भी यही करो, बिना यह जाने कि उस व्यक्ति की इसमें रूचि है भी कि नहीं वह इस कार्य को लंबे

समय तक कर भी पाएगा कि नहीं और आप भी चुपचाप उस कार्य को करने लग जाते हैं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि होश की कमी है यदि होश होता तब थोड़े आप चुपचाप मान लेते।

हम जीवन में सभी कार्य बस यूं ही करते जाते हैं यंत्र की भांति हमें पता ही नहीं होता कि हम वह कार्य क्यों कर रहे हैं, उसको करने का उद्देश्य क्या है हमें नहीं पता होता,  कोई हमसे कहता है कि यह कार्य कर लो क्योंकि सभी लोग यही कार्य कर रहे हैं अतः तुम भी यही करो, बिना यह जाने कि उस व्यक्ति की इसमें रूचि है भी कि नहीं वह इस कार्य को लंबे समय तक कर भी पाएगा कि नहीं और आप भी चुपचाप उस कार्य को करने लग जाते हैं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि होश की कमी है यदि होश होता तब थोड़े आप चुपचाप मान लेते।


पूरा जीवन हम बेहोशी में बीता देते हैं, अंत समय में हम पाते हैं कि हम तो खाली के खाली रह गए हमें तो कुछ भी हासिल नहीं हुआ। 
इस जीवन का सबसे बड़ा रिस्क यही है कि इंसान जब तक मृत्यु तक पहुँचता है तो वह होश पूरी तरह से खो देता है , उसे आगे की यात्रा का कुछ भी अंदाजा नहीं होता, वह बेहोशी के गर्त में गिरता चला जाता है और फिर मन उसे नचाता रहता है, खेल खेलता है। अतः जीवन में होश का बड़ा महत्व है, यदि होश को बढ़ाने का प्रयास किया जाए तो, व्यक्ति अपनी मृत्यु को भी होशपूर्वक देख पाएगा, वास्तव में बेहोशी ही मृत्यु है, जिसने अपने होश को जगा लिया, वह फिर कभी नहीं मरता।

जीवन के रहते हमें थोड़ा बहुत होश रहता है, लेकिन वह होश केवल भौतिक ही होता है, जब मृत्यु आती है तब व्यक्ति को कुछ भी होश नहीं रहता, क्योंकि वह पारलौकिक जगत के बारे में कुछ भी नहीं जानता, वह जान ही नहीं पाता है कि आखिर हुआ क्या है? वह कहाँ जा रहा है, यह सब नाटक मन के कारण होता है, मन आत्मा को नाच नचाता है, क्योंकि आत्मा मन से चिपक जाती है, इसलिए आत्मा भटकती है, यहाँ ये बात समझ लें कि यदि आत्मा मन से अलग हो जाए तो आत्मा के भटकने का कोई कारण नहीं, आत्मा भटक ही नहीं सकती, आत्मा का मन से अलग होना ही मुक्ति है और यही आत्मा का उद्देश्य भी है।

अब प्रश्न उठता है कि आखिर आत्मा भटकती क्यों है? क्योंकि आत्मा मन से चिपक जाती है, मन से कैसे चिपकती है यह समझने के लिए ये समझना होगा कि मन क्या है, मन और कुछ नहीं ये हमारे संस्कारों, धारणाओं, विचारों और कर्मों का समूह है और ये सभी मिलकर आत्मा को ढक लेते हैं जिस कारण मन आत्मा के ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता और फिर आत्मा को जैसे चाहे वैसे चलाता है, यही आत्मा के दुःख का कारण भी है।



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